नवरात्रि के पावन पर्व का चौथा दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप, मां कुष्मांडा को समर्पित होता है। इन्हें सृष्टि की रचयिता और आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार व्याप्त था, तब मां कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण इन्हें सृजन, प्रकाश और जीवन ऊर्जा की देवी कहा जाता है।
ज्योतिष और अंकशास्त्र के दृष्टिकोण से, मां कुष्मांडा का संबंध विशेष रूप से सूर्य (Sun) और बृहस्पति (Jupiter) ग्रहों से माना जाता है। सूर्य आत्मा, ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक है, जबकि बृहस्पति ज्ञान, विस्तार और सकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों ग्रहों की संयुक्त ऊर्जा जीवन में विकास, आशावाद और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में मार्गदर्शन करती है। मां कुष्मांडा की उपासना व्यक्ति को नकारात्मकता से दूर कर सकारात्मक शक्तियों की ओर अग्रसर करती है।
मंत्र:
“या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।”
इस मंत्र के जप से साधक को मानसिक शांति, ऊर्जा और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। यह मंत्र व्यक्ति के आंतरिक बल को जागृत कर जीवन के कठिन मार्गों को सरल बनाता है।
नवरात्रि के इस दिन मां कुष्मांडा को मालपुए का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह प्रसाद न केवल देवी को प्रिय है, बल्कि यह समृद्धि और आनंद का प्रतीक भी है। सच्चे मन से की गई उपासना से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और बाधाओं के बीच भी सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
अंकशास्त्र के अनुसार, यह दिन सृजनात्मक ऊर्जा को जागृत करने का विशेष अवसर है। यदि व्यक्ति इस दिन अपने विचारों और कर्मों को सकारात्मक दिशा में केंद्रित करता है, तो उसे दीर्घकालिक सफलता और संतुलन की प्राप्ति होती है।
अंततः, मां कुष्मांडा की आराधना हमें यह सिखाती है कि एक छोटी सी सकारात्मक सोच और मुस्कान भी जीवन में बड़े बदलाव ला सकती है। उनके आशीर्वाद से हर अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है।
जय मां कुष्मांडा।










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