
माँ गौरी, माँ माया नवरात्रि के आठवें दिन पूजा करने वाली देवी दुर्गा का आठवाँ स्वरूप है, जो तपस्या, पवित्रता और करुणा का प्रतीक है। पुरानी कथा के अनुसार, भगवान शिव को पाने के लिए पार्वती जी ने वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया। शिव जी ने गंगाजल से उन्हें स्नान कराया, जिससे वे गौरी और अत्यंत तेजस्वी हो गए। इसलिए उनका नाम माँ गौरी, माँ माया है।
माँ पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर निर्जला तपस्या की थी। इस कठोर तप के कारण उनका शरीर धूल और तप की कलिमा से काला पड़ गया था। माँ गौरी की पूजा हमें अज्ञानता से दूर करती है और मन की शुद्धि का संदेश देती है।
माँ के एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू है, तीसरे हाथ में अभयमुद्रा और चौथे हाथ में वरमुद्रा में होता है। अष्टमी के दिन माँ गौरी की पूजा करने से व्यक्ति को मन चाहा साथी और सुख समृद्धि मिलती है।
अष्टमी के दिन माँ देवी माँ गौरी के मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र हैं:
- “देवी महा गौरी नमः”
- “या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमो नमः”
आप इन मंत्रों का जाप ग्यारह बार, इक्कीस बार या एक सौ आठ बार कर सकते हैं, जितना आप अपनी यथाशक्ति के हिसाब से कर सकते हैं। पर भाव से करें और बड़ी अच्छी इंटेंशन के साथ करें। अच्छी इंटेंशन और अच्छे भाव की माँ के हृदय तक पहुँचाने का एक मात्र तरीका यही है।
आप अपनी जैसी क्षमता है वैसा करें, लेकिन जितना भी करें, उतना हृदय से करें और अच्छी इंटेंशन के साथ करें। माँ माया के मंत्रों को पढ़ने से आपके हृदय में सुकून और एक विश्वास और हर मुश्किल को फेस करने की ताकत पैदा होती है।
अगर आप किसी भी दुविधा और परेशानी में हैं, तो आप इसे मानसिक जाप कर सकते हैं। माँ के आगे माँ गौरी के आगे अपनी प्रार्थना करें और विश्वास रखें कि माँ गौरी आपके उस प्रार्थना को आपकी उस परेशानी को आपकी पूजा को वो सुन रही है और वो जरूर अपना आशीर्वाद आपको देंगी। 😊









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